Saturday, 20 August 2016

इस्लाम की निगाह में शादी और परिवार का महत्व आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में

इस्लाम की निगाह में शादी और परिवार का महत्व आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में

हदीस और इतिहास की किताबों में मिलता है कि रसूलुल्लाह स.अ. जब किसी हेल्दी और स्वस्थ जवान को देखते तो उससे पूछते थे: क्या तुमनें शादी कर ली है? अगर उसका जवाब यह होता था कि मैंनें अभी तक शादी नहीं की है और न ही कोई काम करता हूँ तो आप फ़रमाते “यह जवान मेरी नज़रों से गिर गया”।
इससे पता चलता है कि इस्लाम सारी ज़िन्दगी अकेला रहने को पसंद नहीं करता बल्कि वह यह चाहता है कि जब इन्सान जवान हो जाए तो शादी करे, फ़ैमिली बनाए और फ़ैमिली के साथ ज़िन्दगी बिताए। इस्लाम की नज़र में उसके लिये बहुत सारे फ़ायदे हैं:

1. ख़ुदा नें इन्सान के अन्दर काम वासना रखी है जिसके कारण इन्सान के अन्दर एक ख़ास प्रकार की भावना उठती है और उस भावना का पूरा होना बहुत ज़रूरी है। कुछ लोग इसे ग़लत तरीक़े से पूरा करते हैं लेकिन धर्म (ख़ासकर इस्लाम) इन्सान को उसे सही तरह से पूरा करने और उस वासना के सही इस्तेमाल के तरीक़े सिखाता है। इस्लाम कहता है शादी करो, फ़ैमिली बनाओ ताकि अपनी कामवासना का सही इस्तेमाल कर सको और उसे ग़लत रास्ते पर प्रयोग न करो।

2. ज़िन्दगी की एक स्टेज में पहुँचकर हर इन्सान को किसी ऐसे दोस्त की ज़रूरत होती है जो उससे मुहब्बत करने वाला हो, जिसे देखकर उसे सुख मिले, जिसके साथ वह अपना दुख सुख बाँट सके, जो उसका हमराज़ व उसका घनिष्ट हो और वह दोस्त और हमजोली एक औरत ही होती है या औरत के लिये मर्द होता है। जब यह एक बंधन में बंध जाते हैं तो फ़ैमिली बनती है, घर बनता है और उस घर में वह सब कुछ होता है जो एक इन्सान की असली ज़रूरत है यानी प्यार, मुहब्बत, चैन, दोस्ती, सुख, यह चीज़ें अकेले इन्सान को नहीं मिल सकती या आम दोस्ती में भी यह चीज़ें नहीं मिलतीं या ग़लत रास्ते से भी इन चीज़ों को हासिल नहीं किया जा सकता।

3. इस्लाम नें शादी और फ़ैमिली द्वारा मर्दों और औरतों दोनों की ज़िम्मेदारियों को बाँटा है और दोनों की मर्यादा को भी तय कर किया है। इस्लाम नें मर्द के मज़बूत जिस्म, पक्के इरादे और कठोर होने की वजह से घर और बाहर के सख़्त काम उसके कंधों पर डाले हैं और औरतों के ज़िम्मे हल्के काम रखें हैं। घर का ख़र्च, सारी ज़रूरतों का पूरा करना, मेहनत मज़दूरी करना, दौड़ धूप करना, ख़ून पसीना बहा कर हलाल की रोटी कमाना, यह मर्द की ज़िम्मेदारी है, यह औरत की ज़िम्मेदारी नहीं है। दूसरी तरफ़ घर के कामों में भी औरतों के साथ ज़ोर बरदस्ती नहीं की जा सकती बल्कि उसमें भी वह आज़ाद हैं, अगर वह अपनी मर्ज़ी से वह काम करना चाहें तो ठीक है वर्ना मर्द उसके साथ ज़बरदस्ती नहीं कर सकता और न ही उसे आर्डर दे सकता है कि वह घर के काम करे। यह और बात है कि औरत का नेचर कुछ ऐसा होता है कि वह ख़ुद घर के काम करना चाहती है, अपने पति की सेवा करना चाहती है, बच्चों का पालन पोषण करना चाहती है लेकिन यह सब काम औरत की ड्यूटी नहीं हैं बल्कि यह उसका बड़ापन है कि वह ख़ुद से यह काम करती है। अब अगर कोई मर्द उसमें ज़बरदस्ती करता है या अपने ताक़तवर होने का फ़ायदा उठाकर उससे ज़्यादा काम लेता है तो यह अत्याचार है जिसे इस्लाम और ख़ुदा पसंद नहीं करता। हमारे समाज में परिवारों में बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो ग़लत हैं लेकिन उन्हें इस्लाम का और दीन का नाम दिया जाता है कि इस्लाम नें ऐसा कहा है, इस्लाम नें मर्द को यह ड्युटी दी है, इस्लाम नें औरतों पर यह ज़िम्मेदारी डाली है, जैसे बहुत से काम जिनके बारे में यह सोचा जाता है कि यह औरतों का कर्तव्य है और इस्लाम नें कहा है जबकि इस्लाम नें इस तरह की कोई बात नहीं की है, हमें उनके बारे में मालूम होना चाहिये कि क्या इस्लाम में है और क्या इस्लाम में नहीं है ताकि हम अपनी रस्मों को इस्लाम का नाम दे सकें।

4. अगर घर में किसी बात पर अन बन हो जाए, किसी बात पर झगड़ा हो जाए तो इस्लाम कहता है कि मर्द और औरत ख़ुद उस समस्या का समाधान ढ़ूंढ़ें, अगर मर्द कहीं तेज़ी दिखा रहा है तो औरत ठण्ढ़े और नर्म व्यवहार से काम ले और अगर औरत से कोई ग़लती हुई है तो मर्द उसे सज़ा देने के बजाए उसे उसकी ग़लती के प्रति अवगत करे। घर का झगड़ा बाहर न जाए ताकि घर जहन्नुम न बन जाए, ज़िन्दगी अजीरन न बन जाए। दोनों गर्मी और तेज़ी न दिखाएं। एक दूसरे की ग़लतियों को माफ़ करें। अगर ऐसा होगा तो कोई भी घर टूटेगा नहीं, घर की छोटी सी जन्नत जहन्नम नहीं बनेगी।